← All essays

Das Lakshan Parva 5 min read

मार्दव धर्म: आत्म-नम्रता की अभिव्यक्ति

मार्दव धर्म के बिना क्षमा अधूरी है, क्योंकि क्षमा तभी संभव है जब मन नम्रता को अंगीकार करता है।

दशलक्षण धर्म पर्व २०२६

Ten virtues, one each day · 3 of 10 written

  1. क्षमा Forgiveness
  2. मार्दव Humility
  3. आर्जव Simplicity
  4. शौच Purity
  5. सत्य Truth
  6. संयम Restraint
  7. तप Austerity
  8. त्याग Renunciation
  9. आकिंचन्य Detachment
  10. १० ब्रह्मचर्य Chastity

प्रिय जन
ॐ नमः
देव शास्त्र गुरु को नमन।
आज उत्तम मार्दव धर्म का दिन है।

(दशलक्षण धर्म पर्व का दूसरा लक्षण)

दशलक्षण धर्म पर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म की आराधना की जाती है। यह पर्व आत्मा को अहंकार, दम्भ और आत्म-गर्व से मुक्त करने की प्रेरणा देता है। मार्दव धर्म के बिना क्षमा अधूरी है, क्योंकि क्षमा तभी संभव है जब मन नम्रता को अंगीकार करता है।

जैन दर्शन में दशलक्षण धर्म पर्व केवल एक वार्षिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि के दस गुणों की क्रमबद्ध साधना है। क्षमा धर्म के पश्चात दूसरे लक्षण “मार्दव धर्म” का स्थान है, जो साधक के अहंकार, दम्भ, और आत्म-गर्व को गलाने की प्रक्रिया है। यह धर्म आत्मा के आंतरिक स्थैर्य को नम्रता के रूप में उद्घाटित करता है—जो आत्म-विकास की दूसरी सीढ़ी है।

मार्दव शब्द की साहित्यिक विवेचना

मार्दव शब्द संस्कृत के “मृदु” मूल से निर्मित है, जिसका अर्थ होता है—नरम, विनम्र, कोमल। “मार्दव” का संधि-विच्छेद करने पर “मृदु + तव” बनता है, अर्थात ‘मृदुता की स्थिति’। साहित्यिक दृष्टि से यह शब्द आत्मा की कोमलता का प्रतीक है—ऐसा भाव जो न केवल दूसरों के प्रति सौहार्दपूर्ण है, बल्कि स्वयं के भीतर छुपे कठोर अहंभाव का विघटन करता है।

शास्त्रों में कहा गया है—

“मार्दवमात्मनः शोभा”
— मार्दव आत्मा की वास्तविक शोभा है।

जैन आगमों में भी इसे अत्यंत महत्त्व का धर्म माना गया है। द्रव्यसंग्रह, और प्रवचनसार में मार्दव की प्रशंसा करते हुए बताया गया है कि यह धर्म आत्मा को कठोरता और अभिमान से मुक्त करता है। एक अन्य सूत्र में कहा गया है कि “मार्दव धर्म के बिना क्षमा अधूरी है, क्योंकि क्षमा तभी आती है जब मन नम्रता को अंगीकार करता है।”

दशलक्षण धर्म पर्व में मार्दव का स्थान

जब साधक क्षमा के द्वारा क्रोध कषायों को शांत कर लेता है, तब उसका अगला कदम होता है— मान कषाय का मर्दन करना अर्थात अपने अहंकार को गलाना। दशलक्षण धर्म पर्व के दूसरे दिवस में “मार्दव धर्म” का विशेष स्वाध्याय और मनन किया जाता है ताकि साधक अपने भीतर छिपे अभिमान, स्वार्थ, और दंभ की भावना को पहचान कर त्याग सके।

मार्दव की साधना केवल व्यवहार में नम्रता नहीं, बल्कि दृष्टिकोण में परिवर्तन है। यह उस स्थिति की ओर ले जाता है जहाँ साधक किसी से श्रेष्ठ होने की भावना को त्याग देता है और समभाव की ओर अग्रसर होता है। उत्तराध्ययन सूत्र में उल्लेख है— “मार्दवात् आत्मा दुःख से निवृत्त होती है”। अहंकार दुखों का मूल है, और मार्दव उसका निषेध करता है।

मार्दव धर्म का आत्मिक पक्ष

मार्दव धर्म की साधना आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप के निकट लाती है। जब व्यक्ति अपने ज्ञान, शक्ति, और योग्यता पर घमंड करना छोड़ देता है, तब उसका मन मृदु बनता है। यह धर्म बताता है कि नम्रता कमजोरी नहीं, बल्कि आत्म-सम्बोधन की गहराई है। ज्ञानार्णव ग्रंथ में मार्दव को आत्मा की मिट्टी बताया गया है—जिसमें अन्य धर्मों की खेती फलती है। यह धर्म भीतर की कठोरता को शिथिल करता है और आत्मा को स्वयं के दोषों को स्वीकारने योग्य बनाता है। नम्र व्यक्ति ही दोषों का परित्याग कर सकता है, और सुधार के पथ पर चल सकता है।

मार्दव धर्म और व्यवहारिक जीवन

वर्तमान समय में जब व्यक्ति पद, धन, और योग्यता के बल पर स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है, तब मार्दव धर्म की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है। यह केवल धार्मिक सिद्धांत नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का आधार है। नम्रता से किया गया कार्य और मृदु वचन संबंधों को जोड़ता है, जबकि अहं से किया गया व्यवहार उन्हें तोड़ता है। जैन संतों द्वारा कहा गया है—“जहाँ मार्दव है वहाँ समत्व है, और जहाँ समत्व है वहाँ धर्म है।”

मार्दव धर्म हमें यह सिखाता है कि वास्तविक बल वह नहीं जो दूसरों को दबाए, बल्कि वह है जो स्वयं को दंभ रहित बनाए। जो व्यक्ति नम्र होता है वह विनम्रता से ज्ञान स्वीकार करता है, वह दूसरों की बातों को सुनता है, और सुधार की ओर बढ़ता है।

जैन ग्रंथों में मार्दव की प्रशंसा

जैन आगमों में मार्दव को मनोविकारों का नाशक कहा गया है। विवेकविलास ग्रंथ में इसका विशेष वर्णन है—जहाँ नम्रता को आत्मा का अलंकार बताया गया है। समवायांग सूत्र में कहा गया है— “मार्दव धर्म सच्चे श्रावक की पहचान है।” श्रावक के आचरण में यदि नम्रता नहीं है, तो अन्य धर्मों की साधना निष्फल हो जाती है। इसलिए दस धर्मों की श्रृंखला में मार्दव को क्षमा के तुरंत बाद रखा गया है—क्योंकि क्रोध का शमन नम्रता के बिना स्थायी नहीं हो सकता। मान कषाय का अन्त कर आत्मा में मार्दव धर्म की स्थापना की जाती है।

साधना के सोपान में मार्दव की भूमिका

आत्मिक उन्नयन की सीढ़ियाँ यदि देखें तो मार्दव एक अनिवार्य पायदान है। यह धर्म केवल व्यवहार नहीं, बल्कि एक मानसिक स्थिति है। जब साधक यह स्वीकार करता है कि उसे अभी बहुत कुछ सीखना है, सुधारना है, और जानना है, तभी वह सच्ची साधना की ओर बढ़ता है। दशलक्षण धर्म पर्व में इस गुण का मनन केवल एक दिन तक नहीं सीमित रहता—बल्कि उसका प्रभाव पूरे वर्ष भर चलता है। यह पर्व आत्मा को उसकी मूल भावनाओं की याद दिलाता है—कि वह कोमलता और सहिष्णुता में ही अपना कल्याण पा सकती है।

जैन आगमों और टीकाओं में इस धर्म का शुद्ध रूप “मार्दव” है। यह शब्द “मृदु” धातु से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है कोमलता या नम्रता।

जैसे राजवार्तिक में स्पष्ट रूप से कहा गया है:

“मृदोर्भावो मार्दवम्” — मृदुता का भाव ही मार्दव है।

इसी प्रकार सर्वार्थसिद्धि में मार्दव धर्म को उस अवस्था से जोड़ा गया है जहाँ व्यक्ति कुल, रूप, जाति, बुद्धि, तप, शील आदि में किंचित भी अभिमान नहीं करता।

Comments

Loading comments…

    Leave a comment

    Comments appear after they're approved.

    ← Back to all essays