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Das Lakshan Parva 6 min read

उत्तम क्षमा धर्म: आत्म-शुद्धि की प्रथम सीढ़ी

दशलक्षण धर्म का आरंभ क्षमा धर्म से होता है क्योंकि यह आत्मा को शुद्धि की दिशा में अग्रसर करने का प्रथम कदम है।

दशलक्षण धर्म पर्व २०२६

Ten virtues, one each day · 3 of 10 written

  1. क्षमा Forgiveness
  2. मार्दव Humility
  3. आर्जव Simplicity
  4. शौच Purity
  5. सत्य Truth
  6. संयम Restraint
  7. तप Austerity
  8. त्याग Renunciation
  9. आकिंचन्य Detachment
  10. १० ब्रह्मचर्य Chastity

प्रिय जन
ॐ नमः
देव शास्त्र गुरु को नमन।
आर्यिका १०५ श्री अन्तिम श्री माता जी को नमन।

इससे पहले कि मैं प्रथम दिन का लेख प्रस्तुत करूँ कुछ भूमिका लिख रहा हूँ। कुछ समय से मैं सोच रहा था कि अपने परिवार को अपने जीवन के अनुभवों से अथवा उन से प्राप्त सीख से अवगत कराऊँ और जिसके लिए ८० वर्षों का अनुभव उचित होगा लेकिन बाद में देखा कि जीवन का क्या भरोसा! शुभ विचार हो तो शीघ्र कार्य करना चाहिए अतः अपने आप को इस योग्य बना कर पहले ही यह कार्य प्रारम्भ कर रहा हूँ। अस्तु!

दशलक्षण धर्म पर्व

धर्म शब्द के अनेक संदर्भों में अनेक अर्थ होते हैं। यहाँ धर्म का अर्थ धारण करना है आत्मा का अर्थात अपना स्वयं का जो गुण है वह धारण करना है। पहले के ४ दिन अपनी आत्मा में से ४ कषाय को निवारण कर अथवा कम से कम करके उस संबंधित गुण ग्रहण करना है और बाकी के ६ दिन ६ गुणों को धारण करना है उनका विकास करना है।

उत्तम क्षमा: ४ कषायों में पहली कषाय क्रोध है। इनकी तीव्रता अथवा गहनता के ४ स्तर हैं जिसकी उपमा पानी पर बनाई लकीर, रेत पर की लकीर, लकड़ी पर बनाई लकीर और पत्थर पर बनाई लकीर के समान हैं जो स्थाई हो जाती है। यह उत्तम क्षमा किसी से क्षमा मांगने का दिन नहीं है बल्कि अन्य की गलती होने पर भी क्रोध न कर अपने मन में क्षमा धारण करना है।

दशलक्षण धर्म पर्व: आत्मा की शुद्धि हेतु

जैन दर्शन में आत्मा की शुद्धि हेतु दस उत्तम गुणों की क्रमिक साधना को दशलक्षण धर्म पर्व कहा जाता है। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक आत्म-परिष्कार यात्रा है—जिसमें साधक उत्तम क्षमा धर्म से आरंभ कर उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म तक पहुंचता है। हर धर्म कार्मिक रूप से आत्मा के किसी विकार का निवारण करता है और आत्मा में किसी गुण की स्थापना करता है। इनके साथ साधक अपने आप को मोक्ष की दिशा में अग्रसर करता है।

उत्तम क्षमा धर्म: आत्म-शुद्धि की प्रथम सीढ़ी

प्राचीन भारतीय विचारधारा में “क्षमा” शब्द केवल एक नैतिक गुण नहीं बल्कि आध्यात्मिक उन्नयन का मूल आधार है। जैन धर्म के दस लक्षण धर्मों में क्षमा को प्रथम स्थान देना इस सिद्धांत को दर्शाता है कि बिना क्षमा की भावना के आत्म-संयम और आत्म-उत्कर्ष की यात्रा आरंभ ही नहीं हो सकती। यह केवल दोषों को क्षमा करना नहीं, अपितु अपने भीतर की प्रतिक्रियात्मकता, कषायों और अहंकार को शमित करना है। विशेष रूप से सबसे पहले क्रोध कषाय को आत्मा से निकालना है। यद्यपि प्रारंभ में कषाय का पूर्ण अन्त तो सम्भव नहीं है तो भी कषाय की तीव्रता को मंद से मंदतर करना है।

क्षमा शब्द की साहित्यिक विवेचना

“क्षमा” संस्कृत मूल का शब्द है जिसका निर्माण “क्षम्” धातु से हुआ है, जिसका अर्थ होता है—सहन करना, क्षमाशील होना। साहित्यिक दृष्टि से क्षमा एक क्रिया नहीं, एक अवस्था है—जहाँ मनुष्य अपने भीतर की अशुद्धियों, क्रोध, वैर और प्रतिक्रिया को समाप्त कर शांति के धरातल पर स्थित होता है। यह शब्द केवल व्यक्तिगत स्तर पर सहनशीलता नहीं दर्शाता, बल्कि वह आंतरिक क्षमाशक्ति है जो हमें किसी के दोषों को स्वीकार कर उन्हें अपने मन से विदा करने की प्रेरणा देती है।

प्राचीन काल से ही काव्य में क्षमा को एक दिव्य गुण माना गया है। रामायण में श्रीराम कहते हैं—“क्षमावान् पुरुषो भूत्वा शत्रौ अपि न वैरं कुर्यात्”, अर्थात क्षमा करने वाला व्यक्ति शत्रु से भी द्वेष नहीं रखता। यही विचार जैन साहित्य में और अधिक गहराई से प्रस्तुत होता है।

धर्म शब्द की साहित्यिक विवेचना

“धर्म” शब्द का मूल अर्थ है—“धारण करने योग्य”, जो जीवन को उसके श्रेष्ठतम रूप में स्थिरता प्रदान करता है। यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि वह स्थायी सत्य है जिसे धारण कर आत्मा स्वयं को परिष्कृत करती है। धर्म का संबंध ‘धृ’ धातु से है, जिसका अर्थ है धारण करना, संरक्षण करना। जैन ग्रंथों में धर्म को सात तत्वों के अनुशीलन द्वारा आत्म-साक्षात्कार का मार्ग माना गया है।

धर्म शब्द का उपयोग भारतीय साहित्य में कभी न्याय के पर्यायवाची के रूप में, कभी जीवन-पथ के नियमन हेतु और कभी श्रेयस की साधना के रूप में किया गया है। भगवद्गीता में कहा गया है—“स्वधर्मे निधनं श्रेयः”, अर्थात अपने धर्म में मृत्यु भी कल्याणकारी है। जैन दर्शन में यह स्वधर्म आत्मा की शुद्धि में सहायक तत्व है, जो हर क्षण आत्म-संयम की ओर प्रेरित करता है।

क्षमा धर्म की जैन दृष्टि

दशलक्षण धर्म का आरंभ क्षमा धर्म से होता है क्योंकि यह आत्मा को शुद्धि की दिशा में अग्रसर करने का प्रथम कदम है। क्षमा यहाँ केवल दूसरों को दोषमुक्त करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि स्वयं की क्रोधात्मक प्रवृत्तियों को पहचानकर उन्हें विनष्ट करने की साधना है। यह आत्म-निरीक्षण का पर्व है, जहाँ साधक अपनी भूलों, अपने दोषों और कर्मबंधों को देखता है और उन्हें मुक्त करने का संकल्प लेता है।

जैन आगमों में क्षमा को मन:शुद्धि की सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया बताया गया है। श्रावक और श्रमण अर्थात साधु दोनों के लिए यह धर्म आवश्यक है। पापों का प्रायश्चित कर निराकरण तभी सम्भव होता है जब मन पूरी तरह क्षमाशील हो। क्षमा की भावना वह बिंदु है जहाँ द्वेष समाप्त होता है और समत्व का उदय होता है। अत: क्षमा धर्म केवल सामाजिक सौहार्द का तत्व नहीं, बल्कि वह आत्मा की वह आंतरिक अवस्था है जो आत्मा को उसकी शुद्धता की ओर लौटाती है।

आत्म-संयम और क्षमा का सम्बन्ध

क्षमा धर्म आत्म-संयम का मूल है। जब साधक अपने क्रोध, ईर्ष्या, और द्वेष पर नियंत्रण पाता है तभी वह क्षमा को आत्मसात करता है। यह सहज नहीं है; यह तपस्या की गहराई से उत्पन्न होता है। क्षमा, स्वाभिमान नहीं—स्वप्रकाश है। वह रोशनी है जो आत्मा के अंधकार को दूर करती है।

जैन साहित्य में कहा गया है—“जो क्षमा करता है वह धर्म का पालन करता है, जो धर्म का पालन करता है वह आत्मा को मुक्त करता है।” क्षमा में वह शक्ति है जो विकारों को निर्मूल कर सकती है। इसी कारण दशलक्षण धर्म की शुरुआत क्षमा से होती है—क्योंकि जब तक हम क्षमा नहीं कर सकते, हम शुद्ध नहीं हो सकते।

वर्तमान संदर्भ में क्षमा धर्म

आज के सामाजिक परिदृश्य में जहाँ अहंकार और प्रतिक्रियात्मकता हर वार्तालाप में स्पष्ट हैं, क्षमा धर्म पुनः प्रासंगिक हो उठता है। यह हमें बताता है कि सच्चा धर्म वह है जो हमारे भीतर समत्व, सहिष्णुता और आत्मशांति लाए। जब हम क्षमा करते हैं, तब हम केवल व्यक्ति नहीं—समाज को सुधरने का अवसर दे रहे होते हैं।

यही क्षमा का सौंदर्य है—वह बाहर से शांत दिखती है, पर भीतर आत्मा का गहन रूपांतरण करती है। दशलक्षण धर्म का यह पहला चरण एक निमंत्रण है आत्मा को उसकी उच्चतम अवस्था में प्रवेश का। क्षमा धर्म की स्थापना क्रोध कषाय का अन्त करती है। यद्यपि क्रोध कषाय का पूर्ण अन्त तो सम्यक ज्ञान प्रकट होने के समय होता है लेकिन इसे मंद से मंदतर कर अपनी आत्मा में क्षमा धर्म की स्थापना की जाती है।

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